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Parasakthi Movie Review: हिंदी थोपने के खिलाफ उठी आवाज़, 1960 के विद्रोह को ज़िंदा करती तमिल फिल्म

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Parasakthi Movie Review: CBFC कट्स के बाद भी क्यों ज़रूर देखनी चाहिए ‘पराशक्ति’? हिंदी थोपने के विरोध पर बनी शिवकार्तिकेयन की पीरियड तमिल फिल्म, जानिए कहानी, परफॉर्मेंस और रिव्यू.

Parashakti Movie Review : 2026 की शुरुआत तमिल सिनेमा के लिए कुछ खास अच्छी नहीं रही. पोंगल के मौके पर रिलीज़ होने वाली दो बड़ी और लोकप्रिय फिल्मों—विजय की जनानायकन और शिवकार्तिकेयन की पराशक्ति—को कुछ सीन के कारण CBFC के कड़े आपत्तियों का सामना करना पड़ा. जहां जनानायकन अभी भी अटकी हुई है, वहीं पराशक्ति को 20 से ज्यादा कट्स के बाद आखिरकार रिलीज़ करने की इजाज़त मिली.

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हालांकि यह हालात सिनेमा प्रेमियों को निराश कर सकते हैं, लेकिन राहत की बात ये है कि पराशक्ति के पास एक मजबूत कहानी और दमदार कंटेंट है. सुधा कोंगारा के निर्देशन में बनी इस मल्टी-स्टारर फिल्म में शिवकार्तिकेयन, अथर्व और रवि मोहन अहम भूमिकाओं में हैं. फिल्म हमें सीधे 1960 के दशक में ले जाती है, जब हिंदी थोपने के खिलाफ तमिलनाडु में विरोध की चिंगारी भड़की थी.

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फिल्म की शुरुआत ही जबरदस्त है. दो स्टेशनों के बीच दौड़ती तेज़ रफ्तार ट्रेन, अंदर थिरु (रवि मोहन), जो किसी को या किसी चीज़ को तलाश रहा है. बाहर अंधेरी पटरियों पर खड़ा है चेझियान (शिवकार्तिकेयन), आंखों में इरादा और चेहरे पर सख्ती. टकराव होता है, एक ज़बरदस्त एक्शन सीक्वेंस देखने को मिलता है—चेझियान बच निकलता है, थिरु घायल हो जाता है.

अब सवाल उठता है—आख़िर चेझियान है कौन? और ये ‘पुराननुरु स्क्वाड’ क्या है?

अगले 162 मिनट में फिल्म इन सवालों के जवाब देती है और एक ऐसी दुनिया रचती है जो डिटेलिंग में भी मजबूत है और लेखन में भी. पराशक्ति उस दौर की कहानी कहती है, जब हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने की तैयारी थी. अगर ऐसा हो जाता, तो दक्षिण भारत के लाखों लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाती. फिल्म इतिहास का पाठ पढ़ाने के बजाय आम लोगों की ज़िंदगी पर फोकस करती है.

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एक सीन में एक बुज़ुर्ग महिला अपने पोते को मनीऑर्डर भेजने पोस्ट ऑफिस जाती है, लेकिन जब उसे पता चलता है कि पूरा फॉर्म हिंदी में है, तो वह टूट जाती है. “आठवीं तक पढ़ी-लिखी होकर भी उन्होंने मुझे अनपढ़ बना दिया,” उसका दर्द फिल्म की आत्मा को बयान कर देता है.

इस संघर्ष की अगुवाई करता है चेझियान—एक जोशीला और ईमानदार विद्रोही. समय के साथ वह सिस्टम के कठोर तरीकों से टकराता है और एक घटना उसकी सोच को पूरी तरह बदल देती है. वहीं उसका छोटा भाई चिन्ना (अथर्व) शुरू में इस सब से दूर, चंचल और बेपरवाह दिखता है, लेकिन धीरे-धीरे उसके भीतर भी वही क्रांतिकारी जज़्बा जन्म लेता है.

फिल्म का एक बेहद भावुक पल तब आता है, जब दोनों भाई समझते हैं कि वे किस मकसद के लिए लड़ रहे हैं. एक-दूसरे को गले लगाते हुए उनका मौन बहुत कुछ कह जाता है—ये सिर्फ आज की नहीं, आने वाली पीढ़ियों की लड़ाई है.

हालांकि चारों तरफ विरोध और विद्रोह की आवाज़ें हैं, लेकिन फिल्म ऐसे कई शांत और असरदार पल भी देती है. दूसरी तरफ है थिरु—ठंडा, कठोर और इस आंदोलन को कुचलने पर उतारू. एक सीन में उसकी बेरहमी साफ दिखती है, जब वह बिना किसी हिचक किसी को नाले में धकेल देता है. हालांकि उसके किरदार के ‘क्यों’ पर फिल्म थोड़ा कम रोशनी डालती है. एक फ्लैशबैक शायद इसे और मजबूत बना सकता था, लेकिन ये कमी दमदार लेखन के सामने ज्यादा भारी नहीं पड़ती.

थिरु के डायलॉग्स खास तौर पर ध्यान खींचते हैं—खासतौर पर वह लाइन, जहां वह अपनी चोट से उबरने की तुलना तमिल छात्रों को हिंदी सीखने की मजबूरी से करता है.

चेझियान और रत्नमाला (श्रीलीला) के बीच के रोमांटिक पल हल्के-फुल्के हैं और सुधा कोंगारा की पिछली फिल्म सूराराई पोट्ट्रू की याद दिलाते हैं. लेकिन जैसे ही कहानी आगे बढ़ती है, श्रीलीला को भी खुद को साबित करने का पूरा मौका मिलता है. तीन बड़े तमिल सितारों और एक मजबूत महिला किरदार को खुलकर खेलने की आज़ादी देना निर्देशक की बड़ी जीत है.

संगीत की बात करें तो जीवी प्रकाश का काम फिल्म की जान है. गाने मेलोडी और मास अपील के बीच अच्छा संतुलन बनाते हैं. रवि के चंद्रन की सिनेमैटोग्राफी और आर्ट डिजाइन खासतौर पर दंगों वाले दृश्यों में 1960 के दशक के मद्रास को जीवंत कर देती है.

फिल्म में कुछ पैन-इंडिया सरप्राइज़ एंट्रीज़ भी हैं, जो दर्शकों के लिए बोनस की तरह काम करती हैं. कुल मिलाकर, पराशक्ति सिर्फ हिंदी थोपने के विरोध के आंदोलन को सामने नहीं लाती, बल्कि उसके नायकों को सम्मान भी देती है—और साथ ही आज के दर्शकों को बांधे रखने वाला पूरा सिनेमाई पैकेज भी पेश करती है.

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